मजदूरी के दलदल में फंसा बचपना

बचपन , इंसान की जिंदगी का सबसे हसीन पल होता है, न किसी बात की चिंता होती है और न ही कोई जिम्मेदारी। बस हर समय अपनी मस्तियों में खोए रहना, ...

बचपन, इंसान की जिंदगी का सबसे हसीन पल होता है, न किसी बात की चिंता होती है और न ही कोई जिम्मेदारी। बस हर समय अपनी मस्तियों में खोए रहना, खेलना-कूदना और पढ़ाई लिखाई करना। लेकिन सभी का बचपन ऐसा हो यह संभव नहीं है। 

बाल मजदूरी की समस्या से आप सभी अच्छी तरह से वाकिफ होंगे। 
मेरे ज्ञान से और हमारे क़ानून के हिसाब से कोई भी ऐसा बच्चा जिसकी उम्र 14 वर्ष से कम हो और वह जीविका के लिए काम करे बाल मजदूरी कहलाता है। मेरे खयाल से गरीबी, लाचारी और माता-पिता की प्रताड़ना के चलते ये बच्चे बाल मजदूरी के इस दलदल में धंसते चले जाते हैं। 


बड़े शहरों के साथ-साथ आपको छोटे शहरों के भी हर गली नुक्कड़ पर मेरे जैसे कई राजू-मुन्नी-छोटू-चवन्नी मिल जाएंगे जो अपने हालातों के चलते बाल मजदूरी की गिरफ्त में आ चुके होते हैं। और यह बात सिर्फ बाल मजदूरी तक ही सीमि‍त नहीं है इसके अलावा बच्चों को कई घिनौने कुकृत्यों का भी सामना करना पड़ता है ऐसा मैं अपने अनुभव से कह रहा हूँ। जिनका बच्चों के मासूम मन पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ता है। 


कई NGO समाज में फैली इस समास्या को पूरी तरह नष्ट करने का प्रयास कर कर रही हैं। इन NGO के अनुसार 50.2 प्रतिशत ऐसे बच्चे हैं जो सप्ताह के सातों दिन काम करते हैं। और इन मे 53.22 प्रतिशत ऐसे बच्चे हैं जो यौन प्रताड़ना के शिकार हो रहे हैं  तथा नशा के चक्कर में पड़ जाते और इनमें से हर दूसरे बच्चे को किसी न किसी तरह की भावनात्मक रूप से प्रताड़‍ित ‍किया जा रहा है। और जब मैंने  ऐसे बच्चों से बात की तो पता चला कि 50 प्रतिशत बच्चे नशा की आदत में पढ़ कर। शारीरिक प्रताड़ना के शिकार हो रहे हैं।


आज सरकार ने आठवीं तक की शिक्षा को अनिवार्य और निशुल्क कर दिया है, लेकिन साहब लोगों की गरीबी और बेबसी के आगे यह योजना भी निष्फल साबित होती दिखाई देती है। बच्चों के माता-पिता सिर्फ इस वजह से उन्हें स्कूल नहीं भेजते क्योंकि उनके स्कूल जाने से परिवार की आमदनी कम हो जाएगी और उनका परिवार नही चल सकेगा।
और जब यही बच्चे दो वक्त की रोटी कमाना चाहते हैं तब इन्हें बाल मजदूर का हवाला देकर कई जगह काम ही नहीं दिया जाता है साहब। आखिर ये बच्चे क्या करें, कहां जाएं ताकि इनकी समस्या का समाधान हो सके। सरकार ने बाल मजदूरी के खिलाफ कानून तो बना दिए। इसे एक अपराध भी घोषि‍त कर दिया लेकिन क्या कभी इन बच्चों की समस्याओं को गंभीरता से सुनी?
मुझे लगता है कि ये समस्या सिर्फ हमारे भारत देश मैं ही नही बल्कि और भी देशो में है।


क्या आप सभी को नहीं लगता कि कोमल बचपन को इस तरह गर्त में जाने से आप लोग रोक सकते हैं! देश के सुरक्षित भविष्य के लिए वक्त आ गया है कि अब यह जिम्मेदारी वे सभी लोगों को लेनी होगी जो इस देेेस के पढ़े-लिखे समझदार और विद्वान है और उन सभी को जिनके घर में मां लक्ष्मी ने धन का बरसात कर रखा है।
क्या आप लेंगे ऐसे किसी एक मासूम की जिम्मेदारी? 
Comment में ज़रूर बताये....👍

Inspiration from: http://thecarrotblog.com/ and https://therewillbetime.com/

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Sheru: मजदूरी के दलदल में फंसा बचपना
मजदूरी के दलदल में फंसा बचपना
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